"70 साल की उम्र में भी हार नहीं मानी... और आखिरकार हक मिला"
1. गांव और संघर्ष की पृष्ठभूमि- झारखंड के सिमडेगा जिला, पाकरटांड़ ब्लॉक, केसलपुर पंचायत के अंतिम छोर पर बसा है हल्दीबेडा, बरटोली गांव।
चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़, घने जंगल और कच्चे रास्ते। यहां न कोई बस, न कोई ऑटो। यह
कहानी एक वर्ष पूर्व की है किन्तु यह अत्यंत जीवंत और सच्ची घटना है I
पंचायत जाने के लिए 20 KM, ब्लॉक जाने के लिए 30 KM और बैंक जाने के लिए भी 30 KM पैदल चलना पड़ता है। इसी गांव में रहती हैं 70 वर्षीय सरस्वती देवी। बुढ़ापे का सहारा एकमात्र वृद्धा पेंशन थी। पर पिछले कई महीनों से वो भी बंद हो गई।

2. भटकाव, निराशा और जानकारी का अभाव –
पेंशन बंद होने के बाद सरस्वती देवी ने हर दरवाजा खटखटाया। मुखिया के पास गईं केशलपुर, वार्ड सदस्य के पास गईं, पंचायत गईं। बैंक के भी कई चक्कर काटे, पर वहां बताया गया "यहां पेंशन का काम नहीं होता।" सबसे बड़ी बात - उन्हें ये भी नहीं पता था कि समस्या क्या है? उन्हें बस इतना कहा गया "कागज में दिक्कत है" पर कौन सी दिक्कत है, क्यों पैसा रुका है, ये कोई नहीं बता पाया। हर बार खाली हाथ लौटना, हर बार नया आश्वासन और हर बार बढ़ती निराशा। पेट की भूख से ज्यादा तकलीफदेह था सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना। धीरे-धीरे लगा कि अब शायद कुछ नहीं होगा।
3. उम्मीद की किरण:
सूरज कुमार नाग (फिया फाउंडेशन के कार्यकर्ता) से मुलाकात तकदीर ने पलटा खाया एक दिन। हमारे कार्यकर्ता सूरज कुमार किसी काम से हल्दीबेरा गांव पहुंचे थे। वहीं उनकी मुलाकात सरस्वती देवी से हुई। जब पूरी बात सुनी तो कागजात चेक किए। तब जाकर पता चला कि असली वजह पेंशन e-KYC और बैंक e-KYC का लंबित होना है (चूँकि समीर किस्पोत्ता, फिया फाउंडेशन, के नेतृत्व में पाकरतांड प्रखंड में सूरज तथा अन्य कार्यकर्ताओं की सामजिक सुरक्षा से सम्बंधित कामो के लिए कई बार प्रशिक्षण का आयोजन किया जा चूका है जिसके चलते सूरज को भी इन सबके बारे ज्ञान है) जिसके वजह से महीनों से भुगतान रुका हुआ था। सूरज कुमार ने तुरंत कहा - "अम्मा, चिंता मत कीजिए, आपका हक आपको मिलेगा।"
4. गांव में ही हुआ समाधान –
सूरज कुमार ने सबसे पहले गांव में ही ऑनलाइन पेंशन e-KYC की प्रक्रिया पूरी कराई। ताकि एक बुजुर्ग महिला को पहाड़ पार न करना पड़े। इसके बाद बैंक का काम बाकी था। सरस्वती देवी का बेटा बाहर काम करता था। सूरज कुमार ने उससे फोन पर संपर्क किया और पूरी स्थिति समझाई। बेटे ने तुरंत मां को बैंक ऑफ़ इंडिया पाकरतांड बैंक तक सुरक्षित पहुँचाने में मदद की। बैंक में सूरज कुमार नाग ने स्वयं जाकर Bank e-KYC और खाता पुनः सक्रिय करवाने में मदद की।
5. परिणाम:
आंसू, संतोष और नया जीवन जैसे ही प्रक्रिया पूरी हुई, कुछ ही दिनों में सरस्वती देवी के खाते में पिछले महीनों की बकाया राशि ₹75,000 एकमुश्त जमा हो गई।
और साथ में हर महीने नियमित पेंशन भी शुरू हो गई। आज जब उनसे मिलने जाते हैं तो उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती है। कांपते हाथों से आशीर्वाद देती हैं और कहती हैं - "बेटा, मुझे तो ये भी नहीं पता था पैसा क्यों रुका है। लगा था अब मरना ही बाकी है। तुम लोगों ने गांव में आकर मेरा काम कर दिया। तुमने मेरा हक दिला दिया।"
6. इस कहानी का संदेश-
यह कहानी सिर्फ एक पेंशन की नहीं है। यह कहानी है जानकारी के अभाव, भौगोलिक दूरी और सरकारी प्रक्रियाओं के बीच फंसे एक आम इंसान की। यह कहानी बताती है कि अगर सही समय पर सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं। जागरूकता + पहल + परिवार का सहयोग = बदलाव